संजय शर्मा
महिलाओं के उत्पीडऩ को रोकने के उद्देश्य से 1961 में दहेज अधिनियम बनाया गया। इसके लागू होने के साथ ही भारतीय दंण्ड संहिता में धारा 498ए का प्रयोजन किया गया। देहज अधिनियम के लागू होने पर देश की उन महिलाओं को काफी बल मिला, जो किसी न किसी रूप में ससुराल वालों की ज्यादतियों और उत्पीडऩ का शिकार हुआ करती थी। हालांकि हमारे देश में दहेज लेने और देने की प्रथा कब शुरू हुई इसका कोई व्यापक प्रमाण तो मौजूद नहीं है, लेकिन दहेज लेना और देना समाज की रीतियों में शामिल जरूर है। यही कारण है कि दहेज का दानव आज भी अपना मुंह बांए खड़ा है। न जाने देश के किस शहर, कस्बे और गली के नुक्कड़ पर किसको कब लील जाए इसका अंदाजा किसी को नहीं पता है। हमारे देश में जिस तरह कानून बनते है ठीक उसी तरह उनका दुरूपयोग भी होता है, यहां के लोग हर कानून की काट तलाश करने में सक्षम है। दहेज कानून लागू होने के बाद शुरूवात के दो दशकों में इसके अच्छे नतिजे निकले। दहेज कानून को कई महिलाओं ने सही तरीके और बेहतर ढंग से इस्तेमाल किया, लेकिन समय के साथ कानून का इस्तेमाल करने वाले लोगों की मंशा भी बदल गई। अब दहेज कानून का इस्तेमाल दहेज विरोधी के रूप में कम और दुश्मनी व बदला देने के लिए ज्यादा होता है। यहां तक की कुछ मामले एकदम अलग है, जिसके बाद देहज कानून को परिभाषित करने की जरूरत महसुस हुई।
जहां हमारे देश में महिलाओं का स्थान ऊंचा माना गया है, वहीं महिलाओं छवि दया और करूणमयी के रूप स्थापित है। हमारे देश में सीता, द्रौपदी और झांसी की रानी जैसी महिलाओं ने जन्म लिया और समाज को शिक्षा देने और बेहतरी के लिए कई ऐसे वाक्यों को हंसते हुए सहन किया, जिनके बारे में आज की महिलाएं कल्पना भी नहीं कर सकती। इतिहास में महिलाओ के ऐसे कई उदाहरण स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हैं, जिनपर समाज आज भी अमल करते हुए प्रगति की राह पर अग्रसर है। जहां सीता जी ने समाज की भलाई के लिए वनवास काटा और अग्नि परिक्षा दी, इसी तरह झांसी की रानी, इंदिरा गांधी और न जाने कितनी ही महिलाओं ने आगे बढ़कर समाज के सामने शिक्षादायी उदाहरण पेश किए। महिला कानून लागू होने के बाद दहेज के लेनदेन में किसी प्रकार की कोई कमी दर्ज नहीं की गई। उल्टा दहेज की व्याख्या जरूर बदल गई। 21वी सदी में आने के साथ ही समाज फैशन के दौर में प्रवेश कर गया है। इस सदी में रिश्ते भी फैशन की तराजू में तोले जाने लगे है और दहेज तो ऐसा फैशन बन गया है, जो कथित रूप से अमीर-गरीब हर किसी के आंगन की शौभा बन रहा है। अगर इस शौभा में कोई कमी रह जाए तो दहेज कानून को लाकर खड़ा कर दिया जाता है, वरना सब समान्य है। प्राय: दहेज कानून का प्रयोग वे लोग कर रहे हैं, जो आधुनिक्ता की दौड़ में अपने आप को शामिल करने के लिए समाजिक मान्यताओं और पूर्वजों की शिक्षा को ताक पर रख रहे है। ये ही लोग दहेज कानून की आड़ में रिश्तो की बली चढ़ाने का काम कर रहे है।
यह बात देश की सर्वोच्चय अदालत भी अपने फैंसलों में ब्यां कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैंसलों में टिप्पणी करते हुए कहा कि दहेज के लगभग 80 फीसदी मामले सत्य साबित नहीं होते है या फिर उनकी भावना कुछ और ही होती है।
मामला चाहे सही हो या फिर गलत, प्राथमिकी दर्ज होने के बाद सुसराल पक्ष के सभी लोगों को जेल भेज दिया जाता है। इस तरह की टिप्पणी के बाद दहेज कानून पर पूर्नविचार करने की जरूरत है।
इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेश जैन ने पहल करते हुए वर्ष 2003 में एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी। उनका कहना है कि दहेज कानून की मूल भावना, रिश्तों और परिवार को जोडऩा है, लेकिन आज के दौर में यह कानून उल्टा काम कर रहा है। एक बार प्राथमीकि दर्ज होने के बाद परिवार बिखरने से बच जाए इसकी संभावना शुन्य के बराबर है।
नोएडा में वर्ष 2003 में हुए चर्चित निशा शर्मा दहेज प्रकरण ने दहेज कानून में मौजूद खामियों को उजागर किया। इस मामले के बाद धारा 498ए को परिभाषित किए जाने की आवश्यक्ता महसूस की जाने लगी। इस मामले में शादी पुरी हुए बिना ही धारा 498ए लगा दी गई। फिरलहाल यह मामला अदालत में विचाराधीन है। जरूरत है दहेज कानून पर पूनर्विचार और समीक्षा करने की। लेकिन सवाल उठता है कि दहेज कानून में किस तरह के बदलाव किए जाएं। लेकिन जो भी बदलाव हो वह ऐसे हो कि दहेज लोभी बच न सके और एक शरीफ इंसान को बेवजह रूसवा न होना पड़े।
लेकिन दहेज के मामले में एफआईआर दर्ज करने से पहले मामले की जांच करना सरासर गलत होगा। देश भर की पुलिस एफआईआर दर्ज करने के प्रति वैसे ही गंभीर नहीं है। ऐसे में दहेज के मामले में इस तरह की छुट पुलिस के लिए एक हथियार साबित होगी, जिसे वे पीडि़त पक्ष को परेशान करने के लिए इस्तेमाल करेगी।
आप इस लेख पर अपनी राय दे सकते हैं। मेल करें noidabhaskar@gmail.com
महिलाओं के उत्पीडऩ को रोकने के उद्देश्य से 1961 में दहेज अधिनियम बनाया गया। इसके लागू होने के साथ ही भारतीय दंण्ड संहिता में धारा 498ए का प्रयोजन किया गया। देहज अधिनियम के लागू होने पर देश की उन महिलाओं को काफी बल मिला, जो किसी न किसी रूप में ससुराल वालों की ज्यादतियों और उत्पीडऩ का शिकार हुआ करती थी। हालांकि हमारे देश में दहेज लेने और देने की प्रथा कब शुरू हुई इसका कोई व्यापक प्रमाण तो मौजूद नहीं है, लेकिन दहेज लेना और देना समाज की रीतियों में शामिल जरूर है। यही कारण है कि दहेज का दानव आज भी अपना मुंह बांए खड़ा है। न जाने देश के किस शहर, कस्बे और गली के नुक्कड़ पर किसको कब लील जाए इसका अंदाजा किसी को नहीं पता है। हमारे देश में जिस तरह कानून बनते है ठीक उसी तरह उनका दुरूपयोग भी होता है, यहां के लोग हर कानून की काट तलाश करने में सक्षम है। दहेज कानून लागू होने के बाद शुरूवात के दो दशकों में इसके अच्छे नतिजे निकले। दहेज कानून को कई महिलाओं ने सही तरीके और बेहतर ढंग से इस्तेमाल किया, लेकिन समय के साथ कानून का इस्तेमाल करने वाले लोगों की मंशा भी बदल गई। अब दहेज कानून का इस्तेमाल दहेज विरोधी के रूप में कम और दुश्मनी व बदला देने के लिए ज्यादा होता है। यहां तक की कुछ मामले एकदम अलग है, जिसके बाद देहज कानून को परिभाषित करने की जरूरत महसुस हुई।
जहां हमारे देश में महिलाओं का स्थान ऊंचा माना गया है, वहीं महिलाओं छवि दया और करूणमयी के रूप स्थापित है। हमारे देश में सीता, द्रौपदी और झांसी की रानी जैसी महिलाओं ने जन्म लिया और समाज को शिक्षा देने और बेहतरी के लिए कई ऐसे वाक्यों को हंसते हुए सहन किया, जिनके बारे में आज की महिलाएं कल्पना भी नहीं कर सकती। इतिहास में महिलाओ के ऐसे कई उदाहरण स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हैं, जिनपर समाज आज भी अमल करते हुए प्रगति की राह पर अग्रसर है। जहां सीता जी ने समाज की भलाई के लिए वनवास काटा और अग्नि परिक्षा दी, इसी तरह झांसी की रानी, इंदिरा गांधी और न जाने कितनी ही महिलाओं ने आगे बढ़कर समाज के सामने शिक्षादायी उदाहरण पेश किए। महिला कानून लागू होने के बाद दहेज के लेनदेन में किसी प्रकार की कोई कमी दर्ज नहीं की गई। उल्टा दहेज की व्याख्या जरूर बदल गई। 21वी सदी में आने के साथ ही समाज फैशन के दौर में प्रवेश कर गया है। इस सदी में रिश्ते भी फैशन की तराजू में तोले जाने लगे है और दहेज तो ऐसा फैशन बन गया है, जो कथित रूप से अमीर-गरीब हर किसी के आंगन की शौभा बन रहा है। अगर इस शौभा में कोई कमी रह जाए तो दहेज कानून को लाकर खड़ा कर दिया जाता है, वरना सब समान्य है। प्राय: दहेज कानून का प्रयोग वे लोग कर रहे हैं, जो आधुनिक्ता की दौड़ में अपने आप को शामिल करने के लिए समाजिक मान्यताओं और पूर्वजों की शिक्षा को ताक पर रख रहे है। ये ही लोग दहेज कानून की आड़ में रिश्तो की बली चढ़ाने का काम कर रहे है।
यह बात देश की सर्वोच्चय अदालत भी अपने फैंसलों में ब्यां कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैंसलों में टिप्पणी करते हुए कहा कि दहेज के लगभग 80 फीसदी मामले सत्य साबित नहीं होते है या फिर उनकी भावना कुछ और ही होती है।
मामला चाहे सही हो या फिर गलत, प्राथमिकी दर्ज होने के बाद सुसराल पक्ष के सभी लोगों को जेल भेज दिया जाता है। इस तरह की टिप्पणी के बाद दहेज कानून पर पूर्नविचार करने की जरूरत है।
इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेश जैन ने पहल करते हुए वर्ष 2003 में एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी। उनका कहना है कि दहेज कानून की मूल भावना, रिश्तों और परिवार को जोडऩा है, लेकिन आज के दौर में यह कानून उल्टा काम कर रहा है। एक बार प्राथमीकि दर्ज होने के बाद परिवार बिखरने से बच जाए इसकी संभावना शुन्य के बराबर है।
नोएडा में वर्ष 2003 में हुए चर्चित निशा शर्मा दहेज प्रकरण ने दहेज कानून में मौजूद खामियों को उजागर किया। इस मामले के बाद धारा 498ए को परिभाषित किए जाने की आवश्यक्ता महसूस की जाने लगी। इस मामले में शादी पुरी हुए बिना ही धारा 498ए लगा दी गई। फिरलहाल यह मामला अदालत में विचाराधीन है। जरूरत है दहेज कानून पर पूनर्विचार और समीक्षा करने की। लेकिन सवाल उठता है कि दहेज कानून में किस तरह के बदलाव किए जाएं। लेकिन जो भी बदलाव हो वह ऐसे हो कि दहेज लोभी बच न सके और एक शरीफ इंसान को बेवजह रूसवा न होना पड़े।
लेकिन दहेज के मामले में एफआईआर दर्ज करने से पहले मामले की जांच करना सरासर गलत होगा। देश भर की पुलिस एफआईआर दर्ज करने के प्रति वैसे ही गंभीर नहीं है। ऐसे में दहेज के मामले में इस तरह की छुट पुलिस के लिए एक हथियार साबित होगी, जिसे वे पीडि़त पक्ष को परेशान करने के लिए इस्तेमाल करेगी।
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